प्रस्तुत शोध पत्र औपनिवेशिक शासन के दौरान भारत से ब्रिटेन की ओर होने वाले आर्थिक संसाधनों के एकतरफा प्रवाह, जिसे 'धन की निकासी' कहा जाता है, का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है । इस सिद्धांत के प्रणेता दादाभाई नौरोजी ने अपनी कालजयी कृति 'पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया' के माध्यम से यह सिद्ध किया कि भारत की निर्धनता का मूल कारण ब्रिटिश शोषणकारी नीतियां थीं ।
इस शोध का मुख्य उद्देश्य नौरोजी द्वारा प्रयुक्त सांख्यिकीय विधियों और उनके द्वारा चिन्हित निकासी के विभिन्न माध्यमों, जैसे-होम चार्जेस, सैन्य व्यय और व्यापारिक असमानता का मूल्यांकन करना है । शोध पत्र इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे नौरोजी ने पहली बार प्रति व्यक्ति आय की गणना करके ब्रिटिश "सुशासन" के दावों को चुनौती दी । निष्कर्षतः, यह पत्र स्पष्ट करता है कि नौरोजी का यह सिद्धांत न केवल एक आर्थिक विश्लेषण था, बल्कि इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक ठोस वैचारिक और आर्थिक आधार प्रदान किया, जिससे जनता में ब्रिटिश राज के प्रति असंतोष और स्वराज्य की चेतना जागृत हुई ।