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International Journal of History

2022, Vol. 4, Issue 2, Part A

स्वदेशी आन्दोलन काल में आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना


Author(s): डॉ. राकेश कुमार

Abstract: भारत में बीसवी शताब्दी का उदय स्वदेशी आन्दोलन के साथ जु़ड़ा हुआ है। नयी शदी में जन्में इस आन्दोलन से भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन न केवल बल मिला, अपितु देश में एक नयी परम्परा की शुरूआत हुयी। यह था स्वालम्बन, गरम पन्थी विचारधारा का उदय। इस आन्दोलन ने समाज के सभी वर्गाें को प्रभावित किया। जिसका प्रभाव भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के राष्ट्रीय आन्दोलन में 75 वर्षों में आने वाले थे। इस आन्दोलन की शुरूआत बंगाल में 1905 में शुरू हुयी थी। इसका कारण था बंगाल का विभाजन जिसकी रूपरेखा तत्कालीन बाइसराय लार्ड कर्ज़न ने तैयार की थी। चूँकि बंगाल आध्यत्मिक केन्द्र होन के साथ-साथ स्वतन्त्रता संग्राम का गढ़ था। कांग्रेस के ज्यादातर नेता बंगाल से थे। वही समस्त राजनीतिक गातिविधियाँ शुरू होती थी। अतः कर्जन का उद्देश्य एक ऐसे गढ़ को समाप्त करना था। जहाँ पर बंगाली आबादी निवास करती थी एवं कलकत्ता को सिंहासनच्युत करना था। उस समय के तत्कालीन ग्रहसचिव राइसले का कहना था ’’अविभाजित बंगाल एक बड़ी ताकत है। विभाजित होने से कमजोर पड़ जायेंगी हमारा मुख्य उद्देश्य बंगाल का विभाजन है। जिससे हमारे दुश्मन कमजोर पड़ जाये और टूट जाएँ’’। इस उद्देश्य से लार्ड कर्जन ने बंगाल का बँटवारा किया। प्रभाव यह हुआ सभी बंगाली एक हो गये। उन्होंने विदेशी वस्त्रों एवं सामानों का बहिष्कार किया। जिसने भारतीयों में स्वालम्बन एवं आत्मगौरव की भावना का विकास हुआ। राजनैतिक तौर पर दो विचारधारा उदारवादी एवं गरमपन्थी विचारधारा का विकास हुआ।

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How to cite this article:
डॉ. राकेश कुमार. स्वदेशी आन्दोलन काल में आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना. Int J Hist 2022;4(2):09-10.
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