Red Paper
International Journal of History | Logo of History Journal
  • Printed Journal
  • Refereed Journal
  • Peer Reviewed Journal
Peer Reviewed Journal

International Journal of History

2025, Vol. 7, Issue 8, Part A

समाज के विकास में संस्कारों की भूमिका


Author(s): डॉ प्रगति झा

Abstract: भारतीय समाज की संरचना और उसकी निरंतर प्रगति में संस्कारों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। प्राचीन काल से ही मानव जीवन को व्यवस्थित और मर्यादित बनाने हेतु विविध संस्कारों का विधान किया गया। वेद, उपनिषद, धर्मसूत्र तथा स्मृतियाँ इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं कि भारतीय संस्कृति में संस्कार केवल धार्मिक आचार-व्यवहार तक सीमित नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक एकता, नैतिकता, शिक्षा और सांस्कृतिक स्थायित्व के मूल आधार थे। जन्म से मृत्यु तक सोलह संस्कारों की परंपरा ने न केवल व्यक्तिगत जीवन को अनुशासित किया, बल्कि परिवार और समाज को भी एक संगठित स्वरूप प्रदान किया। समाज के विकास की प्रक्रिया में संस्कारों ने तीन स्तरों पर प्रभाव डाला, (1) व्यक्तिगत स्तर पर आत्मविकास, नैतिक बोध और कर्तव्यपरायणता का संवर्धन, (2) पारिवारिक स्तर पर सहयोग, उत्तरदायित्व और अनुशासन की भावना का विकास, तथा (3) सामाजिक स्तर पर धर्म, आचार, रीति-नीति और सांस्कृतिक निरंतरता का संरक्षण। यह शोधपत्र संस्कारों की समाज-निर्माण प्रक्रिया में भूमिका का विश्लेषण करता है, जिसमें प्राचीन धर्मग्रंथों, ऐतिहासिक साहित्य और आधुनिक शोधकार्यों का आलोचनात्मक अध्ययन सम्मिलित है। साथ ही वर्तमान समाज में संस्कारों की प्रासंगिकता पर भी विचार किया गया है। इस अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि संस्कार भारतीय समाज की रीढ़ के रूप में कार्य करते हुए मानव जीवन को आदर्श और समाज को संतुलित दिशा प्रदान करते हैं। संस्कारों की परंपरा भारतीय समाज को एक विशिष्ट पहचान और स्थायी विकास की आधारभूमि प्रदान करती रही है।

DOI: 10.22271/27069109.2025.v7.i8a.565

Pages: 45-49 | Views: 96 | Downloads: 43

Download Full Article: Click Here

International Journal of History
How to cite this article:
डॉ प्रगति झा. समाज के विकास में संस्कारों की भूमिका. Int J Hist 2025;7(8):45-49. DOI: 10.22271/27069109.2025.v7.i8a.565
International Journal of History
Call for book chapter