उपनिवेशवादी शोषण के विरुद्ध ज्योतिबा फुले का वैचारिक संघर्ष
Author(s): गुंजा कुमारी, डॉ० कुमार अमरेन्द्र
Abstract: भारत में उपनिवेशवाद केवल एक राजनीतिक सत्ता का रूप नहीं था, बल्कि उसने सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक शोषण की जड़ें भी गहरी कीं। ब्रिटिश शासन ने भारतीय समाज में पहले से मौजूद जातिगत और लैंगिक असमानताओं का दोहन करते हुए एक ऐसी व्यवस्था निर्मित की, जिसने बहुजन वर्ग को शिक्षा, संसाधनों और अधिकारों से वंचित कर दिया। इस बहुआयामी शोषण के विरुद्ध जिस व्यक्ति ने सबसे प्रभावशाली वैचारिक संघर्ष किया, वे थे महात्मा ज्योतिबा फुले। उन्होंने न केवल ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती दी, बल्कि उपनिवेशवाद से गठजोड़ कर बने शोषण तंत्र की भी गहन आलोचना की। फुले का मानना था कि जाति प्रथा, धार्मिक अंधविश्वास और स्त्री-विरोधी सोच, उपनिवेशवादी शासन को वैचारिक और सामाजिक समर्थन देती है। उन्होंने शिक्षा, सत्यशोधक समाज, और लेखन के माध्यम से बहुजन समाज को जागरूक किया और उन्हें आत्मसम्मान के साथ जीने की प्रेरणा दी। प्रस्तुत शोध-पत्र में फुले के विचारों, आंदोलनों और उनके लेखन के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि उनका संघर्ष केवल सामाजिक सुधारक का नहीं, बल्कि एक क्रांतिकारी वैचारिक योद्धा का था, जो उपनिवेशवादी व्यवस्था की बुनियाद को ही चुनौती देता है। आज भी उनकी विचारधारा सामाजिक समानता और न्यायपूर्ण भारत के निर्माण के लिए प्रेरक सिद्ध होती है।
DOI: 10.22271/27069109.2025.v7.i6b.580Pages: 128-131 | Views: 279 | Downloads: 164Download Full Article: Click Here
How to cite this article:
गुंजा कुमारी, डॉ० कुमार अमरेन्द्र.
उपनिवेशवादी शोषण के विरुद्ध ज्योतिबा फुले का वैचारिक संघर्ष. Int J Hist 2025;7(6):128-131. DOI:
10.22271/27069109.2025.v7.i6b.580