Red Paper
International Journal of History | Logo of History Journal
  • Printed Journal
  • Refereed Journal
  • Peer Reviewed Journal
Peer Reviewed Journal

International Journal of History

2025, Vol. 7, Issue 11, Part B

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और बिहार: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रभाव और हस्तक्षेप


Author(s): बसंत कुमार राणा

Abstract: बिहार में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विमर्श राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की वैचारिक उपस्थिति और सामाजिक हस्तक्षेपों के माध्यम से एक विशिष्ट दिशा ग्रहण करता है। आरएसएस का मूल दृष्टिकोण भारतीय सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं, धार्मिकनैतिक मूल्यों और सामाजिक एकता पर आधारित राष्ट्रनिर्माण को बढ़ावा देना है। बिहार, जो ऐतिहासिक रूप से बौद्ध, जैन और वैदिक परंपराओं का केंद्र रहा है, आरएसएस के लिए सांस्कृतिक पुनर्जागरण का उपयुक्त क्षेत्र बना। संगठन ने शिक्षा, सेवा, ग्रामीण विकास, युवा जागरण और सामाजिक सौहार्द की गतिविधियों के माध्यम से समुदायों में वैचारिक संवाद को मजबूत किया। विशेष रूप से छात्रों और युवाओं में शाखाओं, प्रकल्पों व विचारप्रसार के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना, अनुशासन और आत्मगौरव की भावना विकसित करने पर जोर दिया गया। इसके अतिरिक्त, बिहार के सामाजिकराजनीतिक परिदृश्य में जातिगत संरचनाओं और सामाजिक विखंडन की पृष्ठभूमि में संघ ने जातिसेऊपर सांस्कृतिक एकता के विचार को रेखांकित करते हुए व्यापक सामाजिक समरसता के प्रयास किए। प्राकृतिक आपदाओं, बाढ़, महामारी और जरूरतमंद समुदायों में सेवा कार्यों ने संघ की जनस्वीकार्यता को और भी प्रबल किया। साथ ही, विमर्श के आलोचनात्मक पक्ष में इसे वैचारिक विस्तारवाद, बहुलतावादी सांस्कृतिक परंपरा के संकुचन और राजनीतिक प्रभावविस्तार की दृष्टि से भी देखा जाता है। फिर भी, बिहार में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की समझ और सामाजिकराजनीतिक बहसों पर आरएसएस की सक्रियता ने महत्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तन, सांस्कृतिक जागरण और राष्ट्रीय पहचान के पुनर्संयोजन की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से प्रभावित किया है।

DOI: 10.22271/27069109.2025.v7.i11b.590

Pages: 134-137 | Views: 214 | Downloads: 76

Download Full Article: Click Here

International Journal of History
How to cite this article:
बसंत कुमार राणा. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और बिहार: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रभाव और हस्तक्षेप. Int J Hist 2025;7(11):134-137. DOI: 10.22271/27069109.2025.v7.i11b.590
International Journal of History
Call for book chapter