Abstract: प्राचीन संस्कृत साहित्य में कृषि के संदर्भ बहुतायत में उपलब्ध हैं। कृषि शब्द ऋग्वेद में कई बार आया है, जो आर्यों द्वारा खेती के महत्व को दर्शाता है। उत्तर वैदिक साहित्य कृषि और इसके विभिन्न पहलुओं के बारे में अधिक विस्तृत जानकारी प्रदान करता है। इसके सर्वप्राचीन पुरातात्विक प्रमाण मेहरगढ स्थल से प्राप्त होते हैं जिसकी तिथि 8000-7000 ईसा पूर्व तक है। कृषि भारत के लोगों की आजीविका का मुख्य स्रोत और भारतीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला रही है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में कृषि को सर्वश्रेष्ठ व्यवसाय माना गया है। यजुर्वेद और तैत्तिरीय संहिता में कृषि को मानव कल्याण का साधन माना गया है। यह समृद्धि और जीविका का स्रोत है। अथर्ववेद, अष्टाध्यायी, मार्केण्डेय पुराण, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण, स्मृति साहित्य आदि प्राचीन साहित्य में कृषि एवं उसके महत्व को प्रतिपादित किया गया है। साहित्य के अतिरिक्त इतिहास के लिखित साक्ष्य अभिलेखों में भी कृषि का वर्णन किया गया है इनमें अशोक रूम्मिनदेई अभिलेख, खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख, कनिष्क द्वितीय आरा अभिलेख, रूद्रदमन का जूनागढ अभिलेख, स्कन्दगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख, लक्ष्मणराज द्वितीय का करीतलाई अभिलेख आदि मुख्य हैं।