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International Journal of History

2024, Vol. 6, Issue 1, Part C

वर्तमान समाज में संस्कारों की प्रासंगिकता


Author(s): प्रगति झा

Abstract: भारतीय संस्कृति में संस्कार केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी मार्गदर्शक हैं। आज जब समाज वैश्वीकरण, आधुनिकीकरण और उपभोक्तावाद की चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब यह प्रश्न उठता है कि क्या प्राचीन संस्कार आज भी प्रासंगिक हैं। यह शोधपत्र इसी प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास करता है। संस्कार जीवन के प्रत्येक चरण को पवित्र और अनुशासित बनाने का साधन हैं। गर्भ से लेकर मृत्यु तक संस्कार व्यक्ति को न केवल धर्म और संस्कृति से जोड़ते हैं, बल्कि परिवार और समाज के बीच नैतिक तथा सामाजिक अनुशासन की नींव रखते हैं। वर्तमान समाज में, जहाँ पारिवारिक बंधन कमजोर हो रहे हैं और व्यक्तिगतता बढ़ रही है, संस्कार सामूहिकता और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का कार्य करते हैं। विवाह संस्कार अब भी परिवार संस्था को स्थायित्व प्रदान करता है, उपनयन और विद्यारंभ जैसी परंपराएँ शिक्षा और अनुशासन का महत्व सिखाती हैं, और श्राद्ध संस्कार पूर्वजों के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करते हैं। इस अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि आधुनिकता और विज्ञान के युग में भी संस्कार अप्रासंगिक नहीं हुए हैं। वे केवल पुराने रूप में जमे रहने वाली परंपराएँ नहीं हैं, बल्कि समाज की आत्मा हैं। उनका रूप भले ही बदल रहा हो, लेकिन उनकी मूल भावना, सामाजिक एकता, नैतिक अनुशासन और सांस्कृतिक निरंतरता आज भी उतनी ही आवश्यक है।

DOI: 10.22271/27069109.2024.v6.i1c.564

Pages: 191-194 | Views: 147 | Downloads: 69

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How to cite this article:
प्रगति झा. वर्तमान समाज में संस्कारों की प्रासंगिकता. Int J Hist 2024;6(1):191-194. DOI: 10.22271/27069109.2024.v6.i1c.564
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